अमाँ किशन ख़ाँ, ज़रा इधर तो आओ,
ये ज़िंदगी का मैदान है, अपन अकेले खड़े,
हाथ काँप रए, दिल बैठा जा रया —
लगाम तुम थाम लो, मियाँ।
देखो, झूठ नई बोलेंगे — डर लग रया है।
गांडीव तो छोड़ो, अपन से चाय का गिलास नई संभल रया है,
पर तुम्हीं ने कहा — जो झुक जाए उसी की सुनी जाती है,
तो लो, अपन झुक गए, मियाँ।
और तुमने पहली बात ये कही — कुर्ता है ये देह,
फट जाए तो नया आ जाता है;
भीतर जो बैठा है वो न जलता, न भीगता —
जो डर रया है वो अपन नई, कुर्ता है, मियाँ।
ये ऊँची-ऊँची बातें अपन की समझ से बाहर हैं —
पर एक सवाल और पूछ लें?
जब सब तुम्हीं तय करते हो, अपन के हाथ में कुछ नई,
तो बैठ जाएँ फिर, हाथ पे हाथ धरे, मियाँ?
नई, तुम कहते हो — उठो, काम करो, फल छोड़ दो।
अच्छा; ये बात अपन की समझ में आ गई।
तो दुकान खोलेंगे, मेहनत करेंगे, पसीना बहाएँगे —
हिसाब-किताब तुम रखना, नतीजे का ठेका तुम्हारा, मियाँ।
और अकेले नई छोड़ोगे — ये भी कह दिया तुमने;
जब-जब गड़बड़ बढ़ती है, तुम आ ही जाते हो।
तो अमाँ, एक चक्कर इधर भी लगा लो —
यहाँ भी थोड़ी-बहुत फैली पड़ी है, मियाँ।
पर एक डर और है, कह दें? — छोड़ने का घमंड।
अपन ने वो भी देखे हैं: सब छोड़ दिया,
और फिर उसी छोड़ने की अकड़ पाल ली —
अपने को वैसा मत बनाना, मियाँ।
तालाब का पत्ता देखो, कैसा रहता है —
पानी में ही, दिन-रात, और गीला नई होता।
बस इतनी-सी तरकीब सिखा दो अपने को,
इससे ज़्यादा कुछ नई माँगते, मियाँ।
पर सिखाओगे किसको? ये मन तो टिकता ही नई —
दो मिनट में पूरा भोपाल घूम आता है।
तुमने कहा, रोज़ थोड़ा-थोड़ा बाँधो; ठीक है —
अपन दस मिनट बैठेंगे, तुम टेम पे आ जाना, मियाँ।
और जिस दिन दो पल को ठहरा, उस दिन दिखा —
पानी में जो मिठास है वो तुम,
बड़े तालाब पे जो चाँद हिलता है वो तुम;
आँख खोलें तो तुम, मूँदें तो तुम, मियाँ।
जब हर तरफ़ तुम्हीं हो, तो एक ही फ़िक्र बचती है —
कहते हैं, आख़िर में जो याद रहे वही साथ जाता है।
तो अपन आज से नाम रटना शुरू करते हैं;
ऐन मौके पे भूल गए तो बेइज़्ज़ती हो जाएगी, मियाँ।
वैसे रास्ता तुमने सस्ता ही रखा है, ये अच्छा किया —
पत्ता, फूल, फल, पानी; भाव से दे दो, बस।
तुम्हारी दुकान अपन की जेब के हिसाब की है —
लो, ये दिल है; इससे ज़्यादा कुछ है भी नई, मियाँ।
और जिधर नज़र जाए, तुम्हारा ही पता मिलता है:
पहाड़ों में हिमालय, नदियों में गंगा, हुरूफ़ में 'अ',
और हर उस चीज़ में जिसे देखकर दिल एक पल ठहर जाए —
वो ठहरना ही तुम्हारा पता है, मियाँ।
एक बार तो तुमने पूरा ही खोल दिया था, सुना है —
अनगिनत मुँह, अनगिनत आँखें, आग ही आग;
अमाँ रहने दो! अपन का दिल इतना बड़ा नई —
बंसी वाले रूप में ही सामने बैठे रहो, मियाँ।
अच्छा हुआ, लौट आए। अब ये बता दो —
कौन प्यारा लगता है तुम्हें?
जो जलता नई, दुखाता नई, नफ़े-नुक़सान में बराबर रहता है —
तो अपने को आलिम मत बनाना, बस प्यारा बना लेना, मियाँ।
और उसके लिए करना का है? — खेती।
ये देह खेत है, और तुम इसके जानकार;
जो बोया है वही उगेगा, ये तय है —
तो नरमी बोओ, सब्र बोओ, अकड़ की जड़ें उखाड़ दो, मियाँ।
पर खेत के चारों तरफ़ तीन रस्सी बँधी हैं —
सत, रज, तम; कोई रेशम की, कोई सुतली की,
बाँधती तो तीनों हैं, फ़र्क़ बस दिखावे का है —
तीनों से ऊपर कर दो अपने को, मियाँ।
और ये जो दुनिया है — उल्टा पेड़, जड़ ऊपर डालियाँ नीचे;
कुल्हाड़ी दे रए हो तो वैराग्य की देना, नफ़रत की नई।
मोह काटेंगे, मुहब्बत नई —
और काटकर तुम्हारी ही छाँव में बैठ जाएँगे, मियाँ।
अब ज़रा सामान की बात — दो तरह का माल चलता है यहाँ:
हिम्मत, सफ़ाई, ख़ैरात, संयम, सीधापन — ये तुम भिजवाते रहना;
और घमंड, ग़ुस्सा, दिखावा, सख़्ती — ये तो मुफ़्त में आ जाता है,
इनका दरवाज़ा बंद ही रखना, मियाँ।
और सबका बीज तो श्रद्धा है — 'जैसी श्रद्धा, वैसा आदमी',
ये भी तुम्हारा ही फ़रमाया हुआ है।
तो अपन का खाना, अपन का बोलना, अपन का देना —
ऐसा हो कि किसी को चुभे नई, मियाँ।
और आख़िर में, जब सब हिसाब उलझ जाए,
सब रास्ते गड्डमड्ड हो जाएँ,
तब बस तुम्हारा वो एक जुमला याद रह जाए —
"छोड़-छाड़ के आ जा, फ़िक्र मत कर," मियाँ।
-- एक भोपाली!
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