Sunday, March 8, 2026

माना तुम्हें बहुत कुछ मालूम है

 माना तुम्हें बहुत कुछ मालूम है और तुम बहुत पढ़े लिखे हो।

तुम्हें पता है अंतर, न्याय और अन्याय के बीच का।
तुम लम्बी लम्बी तक़रीरें दे सकते हो की,
अन्याय खा जाएगा हम सबको बिना नून-मिर्च लगाए।
पर तुम कभी घर से नहीं निकले सही में लड़ने को।
तुम छुपे रहे अपने बिलों में भयभीत चूहों की तरह,
ये जानते हुए भी की तुम्हारा ये ज्ञान कुछ मज़बूत कंधों को और बाजुओं को
वजह और गति दे सकता हैं लड़ने की।
तुमसे भले तो वो लोग हैं जो कुत्तों की तरह नोचते खसोटते हैं,
एक दूसरे को और उनको जिसको उनका मालिक कहे।
कम से कम वो जानवर होते हुए भी किसी के तो वफ़ादार हैं।
कम से कम उनकी पूँछ तो हिलती हैं ग़ुलामी में और मुँह तो चलता हैं भूकने और काटने के लिए,
पर तुम एक घोंघे की तरह घूस जाते हो अपने खोल में ज़रा सी आहट पर।
तुम अपराधी हो उस पवित्र और शाश्वत सत्ता की,
जो अन्याय के बढ़ने पर एक भ्रूण की तरह उतरता हैं, हमारे मन में।
वो भ्रूण तुम्हारे मन में भी उतरा पर,
उस इंक़लाब की प्रसव पीड़ा के डर से तुमने इसकी चुपचाप हत्या कर दी हैं।

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