Tuesday, September 15, 2026

किशन ख़ाँ से गुफ़्तगू - गीता के अठारह अध्याय, एक ही बैठक में

अमाँ किशन ख़ाँ, ज़रा इधर तो आओ,
ये ज़िंदगी का मैदान है, अपन अकेले खड़े,
हाथ काँप रए, दिल बैठा जा रया —
लगाम तुम थाम लो, मियाँ।

देखो, झूठ नई बोलेंगे — डर लग रया है।
गांडीव तो छोड़ो, अपन से चाय का गिलास नई संभल रया है,
पर तुम्हीं ने कहा — जो झुक जाए उसी की सुनी जाती है,
तो लो, अपन झुक गए, मियाँ।

और तुमने पहली बात ये कही — कुर्ता है ये देह,
फट जाए तो नया आ जाता है;
भीतर जो बैठा है वो न जलता, न भीगता —
जो डर रया है वो अपन नई, कुर्ता है, मियाँ।

ये ऊँची-ऊँची बातें अपन की समझ से बाहर हैं —
पर एक सवाल और पूछ लें?
जब सब तुम्हीं तय करते हो, अपन के हाथ में कुछ नई,
तो बैठ जाएँ फिर, हाथ पे हाथ धरे, मियाँ?

नई, तुम कहते हो — उठो, काम करो, फल छोड़ दो।
अच्छा; ये बात अपन की समझ में आ गई।
तो दुकान खोलेंगे, मेहनत करेंगे, पसीना बहाएँगे —
हिसाब-किताब तुम रखना, नतीजे का ठेका तुम्हारा, मियाँ।

और अकेले नई छोड़ोगे — ये भी कह दिया तुमने;
जब-जब गड़बड़ बढ़ती है, तुम आ ही जाते हो।
तो अमाँ, एक चक्कर इधर भी लगा लो —
यहाँ भी थोड़ी-बहुत फैली पड़ी है, मियाँ।

पर एक डर और है, कह दें? — छोड़ने का घमंड।
अपन ने वो भी देखे हैं: सब छोड़ दिया,
और फिर उसी छोड़ने की अकड़ पाल ली —
अपने को वैसा मत बनाना, मियाँ।

तालाब का पत्ता देखो, कैसा रहता है —
पानी में ही, दिन-रात, और गीला नई होता।
बस इतनी-सी तरकीब सिखा दो अपने को,
इससे ज़्यादा कुछ नई माँगते, मियाँ।

पर सिखाओगे किसको? ये मन तो टिकता ही नई —
दो मिनट में पूरा भोपाल घूम आता है।
तुमने कहा, रोज़ थोड़ा-थोड़ा बाँधो; ठीक है —
अपन दस मिनट बैठेंगे, तुम टेम पे आ जाना, मियाँ।

और जिस दिन दो पल को ठहरा, उस दिन दिखा —
पानी में जो मिठास है वो तुम,
बड़े तालाब पे जो चाँद हिलता है वो तुम;
आँख खोलें तो तुम, मूँदें तो तुम, मियाँ।

जब हर तरफ़ तुम्हीं हो, तो एक ही फ़िक्र बचती है —
कहते हैं, आख़िर में जो याद रहे वही साथ जाता है।
तो अपन आज से नाम रटना शुरू करते हैं;
ऐन मौके पे भूल गए तो बेइज़्ज़ती हो जाएगी, मियाँ।

वैसे रास्ता तुमने सस्ता ही रखा है, ये अच्छा किया —
पत्ता, फूल, फल, पानी; भाव से दे दो, बस।
तुम्हारी दुकान अपन की जेब के हिसाब की है —
लो, ये दिल है; इससे ज़्यादा कुछ है भी नई, मियाँ।

और जिधर नज़र जाए, तुम्हारा ही पता मिलता है:
पहाड़ों में हिमालय, नदियों में गंगा, हुरूफ़ में 'अ',
और हर उस चीज़ में जिसे देखकर दिल एक पल ठहर जाए —
वो ठहरना ही तुम्हारा पता है, मियाँ।

एक बार तो तुमने पूरा ही खोल दिया था, सुना है —
अनगिनत मुँह, अनगिनत आँखें, आग ही आग;
अमाँ रहने दो! अपन का दिल इतना बड़ा नई —
बंसी वाले रूप में ही सामने बैठे रहो, मियाँ।

अच्छा हुआ, लौट आए। अब ये बता दो —
कौन प्यारा लगता है तुम्हें?
जो जलता नई, दुखाता नई, नफ़े-नुक़सान में बराबर रहता है —
तो अपने को आलिम मत बनाना, बस प्यारा बना लेना, मियाँ।

और उसके लिए करना का है? — खेती।
ये देह खेत है, और तुम इसके जानकार;
जो बोया है वही उगेगा, ये तय है —
तो नरमी बोओ, सब्र बोओ, अकड़ की जड़ें उखाड़ दो, मियाँ।

पर खेत के चारों तरफ़ तीन रस्सी बँधी हैं —
सत, रज, तम; कोई रेशम की, कोई सुतली की,
बाँधती तो तीनों हैं, फ़र्क़ बस दिखावे का है —
तीनों से ऊपर कर दो अपने को, मियाँ।

और ये जो दुनिया है — उल्टा पेड़, जड़ ऊपर डालियाँ नीचे;
कुल्हाड़ी दे रए हो तो वैराग्य की देना, नफ़रत की नई।
मोह काटेंगे, मुहब्बत नई —
और काटकर तुम्हारी ही छाँव में बैठ जाएँगे, मियाँ।

अब ज़रा सामान की बात — दो तरह का माल चलता है यहाँ:
हिम्मत, सफ़ाई, ख़ैरात, संयम, सीधापन — ये तुम भिजवाते रहना;
और घमंड, ग़ुस्सा, दिखावा, सख़्ती — ये तो मुफ़्त में आ जाता है,
इनका दरवाज़ा बंद ही रखना, मियाँ।

और सबका बीज तो श्रद्धा है — 'जैसी श्रद्धा, वैसा आदमी',
ये भी तुम्हारा ही फ़रमाया हुआ है।
तो अपन का खाना, अपन का बोलना, अपन का देना —
ऐसा हो कि किसी को चुभे नई, मियाँ।

और आख़िर में, जब सब हिसाब उलझ जाए,
सब रास्ते गड्डमड्ड हो जाएँ,
तब बस तुम्हारा वो एक जुमला याद रह जाए —
"छोड़-छाड़ के आ जा, फ़िक्र मत कर," मियाँ।


-- एक भोपाली!

Sunday, March 8, 2026

माना तुम्हें बहुत कुछ मालूम है

 माना तुम्हें बहुत कुछ मालूम है और तुम बहुत पढ़े लिखे हो।

तुम्हें पता है अंतर, न्याय और अन्याय के बीच का।
तुम लम्बी लम्बी तक़रीरें दे सकते हो की,
अन्याय खा जाएगा हम सबको बिना नून-मिर्च लगाए।
पर तुम कभी घर से नहीं निकले सही में लड़ने को।
तुम छुपे रहे अपने बिलों में भयभीत चूहों की तरह,
ये जानते हुए भी की तुम्हारा ये ज्ञान कुछ मज़बूत कंधों को और बाजुओं को
वजह और गति दे सकता हैं लड़ने की।
तुमसे भले तो वो लोग हैं जो कुत्तों की तरह नोचते खसोटते हैं,
एक दूसरे को और उनको जिसको उनका मालिक कहे।
कम से कम वो जानवर होते हुए भी किसी के तो वफ़ादार हैं।
कम से कम उनकी पूँछ तो हिलती हैं ग़ुलामी में और मुँह तो चलता हैं भूकने और काटने के लिए,
पर तुम एक घोंघे की तरह घूस जाते हो अपने खोल में ज़रा सी आहट पर।
तुम अपराधी हो उस पवित्र और शाश्वत सत्ता की,
जो अन्याय के बढ़ने पर एक भ्रूण की तरह उतरता हैं, हमारे मन में।
वो भ्रूण तुम्हारे मन में भी उतरा पर,
उस इंक़लाब की प्रसव पीड़ा के डर से तुमने इसकी चुपचाप हत्या कर दी हैं।

Monday, June 21, 2010

मुझे अब मुक्त कर दो.

तुम आज भी मुझमे पैदा करती हो,
जीने की तमन्ना ,
उड़ने की चाहत,
और दौड़ कर कस के तुम्हे बाँहों मे भर लेने की चाहत.

पर क्या करूँ,
तुमने ही तो मेरे इस जीवन मे विष का संचार किया.
तुमने ही तो मेरे पर कतरे.
तुमने ही तो मेरे और अपने बीच समंदर सा फासला पैदा कर लिया.

मैं थक गया हूँ,
तुम्हे देवी और चुड़ैल के अंतर्विरोधी स्वरूपों मे देखते हुए और 
भावनाओ की नदी पर बने पुल पर एक छोर से दूसरे छोर पर दौड़ते हुए.
अब तो एक ही विनती हैं तुमसे मेरी की

मुझे अब मुक्त कर दो.

Thursday, June 3, 2010

जब भी ज़िक्र होता हैं तुम्हारा

जब भी ज़िक्र होता हैं तुम्हारा
मैं चला जाता हूँ एक आत्मावलोकन की अवस्था मे
हो जाती हैं अवस्था मन की ध्यान सी
एक एक पल जो बिताए साथ
खुलने लगते हैं नेत्रपतल पर चलचित्र से

खुद पर आश्चर्य होता हैं की इतने दिन बाद भी
तुम काबिज हो इस दिल पर और तुमने
इसमे कई सेंधमारों से अपनी रक्षा की हैं.
मैं समझ नही पता की

तुम्हारा अब तक मेरे दिल मे टिके रहने का औचित्य क्या है?
आख़िर तुम क्या सिद्ध करना चाहती हो?
तुम तो मेरी सबसे प्रिय सखा रही हो
क्या तुम्हे ये शोभा देता हैं की
तुम मेरी मनः चेतना पर यू सवार
किसी आवारा हिरनी इधर उधर फिरती रहो.

पर सच कहूँ.
तुम्हारा मेरे मनःस्थल पर यूँ फिरना.
बार बार मेरे अहम को चुनौती देता है
और उस चुनौती का मंथन
हर बार मुझसे ऐसा असाध्य कार्य करवा ले जाती हैं

की हर बार मैं आश्चर्यचकित हो जाता हूँ.

मकानमालिक

मुझे एक नया घर तलाशना हैं.

एक समय,
जब तुमने मुझे अपने अपने घर मे पनाह दिया था.
मैने तुम्हारे घर को ही अपना घर समझ लिया था.
तुम्हारे बिस्तर को ही अपना बिस्तर और
तुम्हारे गुसलखाने को ही अपना गुसलखाना समझ लिया था.

मैने भी तो भरे थे उसके दीवारों पर रंग तुम्हारे साथ मिल कर
और लगाए थे उसके बगीचे मे गुलाब के फूल
ये सोच कर की हमारा ये घर हमेशा खिलखिलता रहेगा
इन गुलाबी फूलों की तरह.

पर एक दिन हर एक मकानमालिक की तरह तुमने,
मुझे अपने घर से निकल जाने का फरमान सुना ही दिया.
शायद कुछ और लोग, तुम्हारे अपने आने वाले थे और
अब तुम्हारे घर मे मेरे लिए लिए अब जगह ना थी.

मैं एकाएक गृहस्थ से सड़क पर था.
पर सच कहता हूँ,
सड़क पर सोते हुए भी, मेरे आलिंगन मे तुम ही थी.
इस उम्मीद के साथ की कल फिर हम वो घर साझा करेंगे.

Saturday, March 20, 2010

एक रात एक सॉफ़्टवैयर के साथ

कल रात ऑफीस मे पड़ा पड़ा एक काम निपटा रहा था,
अपने एक क्लाइंट के लिए एक सॉफ़्टवैयर बना रहा था.
जब सॉफ़्टवैयर बन कर पूरा हुआ, तो सोचा ज़रा चला कर देखूं.
महीने भर की अपनी कड़ी मेहनत को ज़रा आज़मा कर देखूं.
सॉफ़्टवैयर के सभी हिस्सों को जोड़ कर उसे तैयार किया.
फिर उसके आइकान पर क्लिक कर उसे चलने को होशियार किया.
जब सॉफ़्टवैयर चला तो ऐसी खुशी हुई,
जैसे मैने भी किसी बच्चे को जना हैं
मेरी इस खुशी के सामने तो मेरी हर खुशी फ़ना हैं.

फिर मैने उसे कुछ कॉंमांड दिया,
उसने उसे खुशी-खुशी स्वीकार किया.
उसने अपनी हर आप बीती खोलकर मेरे सामने रख दिया
बदले मे मैने उसके कुछ और बग्स भी फिक्स कर दिया

फिर तो मैं जो कहता गया वो करता गया
और हमारा याराना पूरी रात परवान चढ़ता गया.
मेरी हर बात पर वो मुझे थैंक यू कहता.
मैं भी उसकी हर थैंक यू को पूरे दिल से आक्सेप्ट करता.

फिर मैने वो किया जो मुझे नही करना चाहिए था.
अपनी ही कृति पर ऐसा निर्मम प्रहार नही करना चाहिए था.
पर मैं देखना चाहता था की,
क्या ये वाकई दुनिया के निर्मम प्रहार सह पाएगा.
बुरा समय आने पर ये कही पीठ तो नही दिखाएगा.

पहले तो उसने मुझे चेतावनी दी.
कहा आप ग़लत हर रहे हो.
मेरी प्राईवेसी मे दखल दे रहे हो.
मुझे भी तैश आ गया,
फिर तो मैने उस पर प्रहारों की झड़ी लगा दी.
दो मिनिट मे ही उसको उसकी औकात दिखा दी.

पहले तो उसे गुस्सा आया,
फिर वो दुखी हुआ ,
और फिर दो दिन के लिए
उसने मुझे अपनी जिंदगी से
बेदखल का दिया.

पता नही क्यूँ, मैं खुश भी था और दुखी भी.
एक सॉफ़्टवैयर का खुश क्या होना और दुखी क्या
उसका खुश होना है क्या
कुछ पंक्ति कोड का संपादित होना
और उसका दुखी होना
कुछ दूसरी पंक्ति कोड का संपादित होना
इसमे कुछ ख़ास है क्या

पर सच बताओ हम भी इस सॉफ़्टवैयर से अलग है क्या.
हम भी खुश होते है और दुखी भी.
हमारा खुश होना है क्या?
हमारे अंदर एक खास भावना का संपादित होना
हमारा दुखी होना है क्या?
हमारे अंदर एक दूसरी भावना का संपादित होना
इसमे कुछ ख़ास है क्या?

फिर हम क्यू खुश होने पर इतना खुश हो जाते हैं
और दुखी होने पर इतने दुखी .
शायद हम है तो सॉफ़्टवैयर ही ना जिसे ईश्वर ने है रचा.
और जिसकी नियती है की वो जीवन पर्यंत,
अपने अंदर भावनाओ को संपादित करते रहने को है बँधा.

सही रास्ता

उफ़, मुझे इस धूप की चुभन बर्दाश्त नहीं.

मुझे एक काला चश्मा दे दो.
मैं अपने मन को मना लूँगा की धूप, हैं ही नहीं.

उफ़, मुझे ये समाज मे फैला अत्याचार बर्दाश्त नहीं.
मुझे दो घूट जाम के दे दो,
मैं अपने मन को मना लूँगा कि ये अत्याचार, हैं ही नहीं.

उफ़, कौन पड़े इस असली और नकली के चक्कर मे.
मुझे अभी सोने दो.
मैं अपने मन को मना लूँगा की मेरे स्वप्न ही असली हैं, 
बाकी कुछ नकली तो हैं ही नहीं.

उफ़, कौन पड़े इस पाप और पुण्य के चक्कर मे,
मुझे अभी लंबा जीवन जीना हैं.
मैं अपने मन को मना लूँगा की मेरे सभी कर्म पुण्य हैं, 
पाप तो मुझसे कभी हुआ है ही नहीं.

पर ये क्या?
उफ़, मेरा ये शरीर जल चुका हैं
इस समाज ने मुझे धोखा दिया हैं.
मैं जीवन मे कुछ कर ना पाया.
मुझे नरक मे धकेल दिया गया हैं.

हे परमात्मा, तुझपे धिक्कार है.
धिक्कार है, धिक्कार है, धिक्कार है.
आख़िर क्यूँ ,तुमने मुझे सही रास्ता कभी, दिखाया ही नहीं.